
उत्तराखंड राज्य के निर्माण (2000) के बाद गाँव-गाँव में सरकारी स्कूल खुलने लगे। उन गाँव में भी जहाँ सिद्ध के प्राथमिक स्कूल चल रहे थे। इन परिवर्तनों और दानदाता संस्थाओं के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव के कारण, सिद्ध ने 2012 तक धीरे-धीरे स्कूल और बालवाड़ियाँ को गाँव वालों की सहमति से बंद करना प्रारम्भ किया। जिन गाँव में समुदाय के सहयोग से स्कूल के लिए भवनों का निर्माण किया गया था उन भवनों को गाँव वालों को ही सौंप दिया व उन पर अपनी कोई मिल्कियत नहीं रखी।
सिद्ध’ ने अपने ग्रामीण स्कूलों को बंद करने का निर्णय लिया, और इसके पीछे दो मुख्य कारण थे।
पहला, उन सभी गाँवों में सरकारी स्कूल प्रारंभ हो चुके थे। दूसरा, हालांकि सरकारी स्कूल खुलने के बाद भी हमारे स्कूलों में बच्चे आ रहे थे, लेकिन हमें दानदाता संस्थाओं की मानसिकता और उनके पीछे की राजनीति भी समझ आ रही थी। इस समझ ने हमें इस जाल से मुक्त होने का निर्णय लेने के लिए प्रेरित किया। इस दूसरे कारण को ‘सिद्ध’ के निर्णय की मूल वजह कहा जा सकता है।
इन दो कारणों के अतिरिक्त, एक और सच्चाई ने ‘सिद्ध’ को अपनी दिशा बदलने के लिए प्रेरित किया। हमें अपने काम, उसकी सोच और उसे करने की पद्धति पर पूर्ण विश्वास था, और आज भी है। परंतु, हमें यह महसूस होने लगा कि हमारे पढ़े-लिखे समाज—गाँव के 10वीं-12वीं कक्षा के छात्रों से लेकर महानगरों के विश्वविद्यालयों से स्नातक हुए लोगों तक—की मानसिकता में पश्चिमी आधुनिकता ने गहरी पैठ बना ली है। इसका परिणाम यह हुआ कि नकल करके आगे बढ़ना ही हमें हर प्रकार का ‘विकास’ प्रतीत होने लगा। इस मोह-पाश में हमने अपनी समझ, विवेक और उससे शक्ति अर्जित करने की क्षमता को खो दिया है। इसलिए, इस पश्चिमी आधुनिकता के भ्रम और इसके मोह-पाश से मुक्त होना अत्यंत आवश्यक हो गया है।
इसके बाद, सिद्ध ने संवाद, शोध और प्रकाशन जैसी गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित किया।
मूल मान्यताएँ
भारतीय परंपराएँ सनातन और शाश्वत सत्य पर आधारित हैं और भारतीय लोग प्रकृति और अस्तित्व के साथ संतुलन में रहते आये हैं। परिणामस्वरूप एक आम भारतीय स्वयं में सहज है और वह प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर अपने जीवन को जीता है।
इण्डिया का पढ़ा-लिखा वर्ग आज उस आधुनिकता में जीने को बाध्य है जिसका अपना कोई वास्तविक आधार ही नहीं है बल्कि वह अपनी काल्पनिक मान्यताओं के आधार पर अस्तित्व को देखता है। इससे व्यक्ति के भीतर द्वन्द्ध और सामाजिक स्तर पर तमाम तरह के संघर्ष उत्पन्न होते हैं।
आधुनिक – शिक्षा, मीडिया इत्यादि ने पढ़े-लिखे भारतीयों की दृष्टि को दूषित कर दिया है। इस दृष्टि दोष की वजह से हम ना तो स्वम को और ना ही शेष संसार को ठीक से देख पा रहे हैं। इसके चलते हमारी सोच, निष्कर्ष और निर्णय लेने की क्षमता भी प्रभावित हो गयी है।
आधुनिकता भ्रामक है। उसने हमें, हमारे दैनिक और सामान्य जीवन के अनुभवों से भी चयुत कर दिया है।
हमारे प्रयास
सिद्ध का उद्देश्य आधुनिकता के भ्रमों और उसके मिथकों को उजागर करना है। ताकि व्यक्ति अपने ‘दृष्टि दोष’ को देख व पहचान सके। इसके बाद ही उन्हें दूर करने का कोई सार्थक प्रयास किया जा सकता है।
गहन संवाद के माध्यम से अपने भीतर उतरने का प्रयास करना व उन मानसिक गतिविधियों की बारीकियों को देखना जिनके द्वारा हम किसी निष्कर्ष अथवा निर्णय पर पहुंचते हैं।
अपने समाज को समझने के क्रम में यह देखना की हमारे साधारण लोग किस प्रकार स्वम को व समाज को देखते हैं। उनकी मान्यताएं क्या हैं। उनके निष्कर्ष अथवा निर्णय पर पहुंचने के आधार क्या हैं।
ऐसा साहित्य जो अभी आसानी से उपलब्ध नहीं है उसे लोगों के सम्मुख लाने का प्रयास करना।
गतिविधियाँ
वर्तमान गतिविधियाँ
परिसंवाद
सिद्ध वर्ष में 3 से 4 नियमित रूप से आवासीय परिसंवाद आयोजित करता है, जिसमें भारतीयता और आधुनिकता के भ्रम को समझने का प्रयास किया जाता है।
ऑनलाइन उपस्थिति
सिद्ध ब्लॉग: साप्ताहिक लेख और विचार।
यूट्यूब चैनल: 175+ वीडियो प्रकाशित, जिनमें चर्चाएँ और विचार-विमर्श शामिल हैं।
टेलीग्राम चैनल: नियमित संवाद का माध्यम।
प्रकाशन:
सिद्ध समय-समय पर भारतीय सभ्यता और इतिहास पर आधारित पुस्तकें प्रकाशित करता है। इसके साथ ही, ऐसी दुर्लभ पुस्तकों का पुनः प्रकाशन भी करता है जो भारतीय इतिहास और वर्तमान का विश्लेषण करती हैं।
शोध
‘सिद्ध’ में भारतीय समाज की परंपरागत ज्ञान प्रणालियों को समझने हेतु शोध कार्यों को प्रोत्साहित किया जाता है, जिनमें शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, भोजन और संगीत आदि शामिल हैं।
टिहरी गढ़वाल के गढ़खेत गाँव में सिद्ध द्वारा स्थापित प्राथमिक स्कूल वर्तमान में एक अभिभावक समिति द्वारा संचालित है। यहाँ 6 गाँवों के लगभग 125 बच्चे (उम्र 3-12 वर्ष) पढ़ाई कर रहे हैं, और 6 शिक्षक कार्यरत हैं। यह स्कूल अभिभावक समिति को हस्तांतरित किया जा चूका है लेकिन अभी सिद्ध द्वारा स्कूल को प्रति माह वित्तीय सहायता प्रदान की जा रही है।
संपर्क और सहयोग:
सिद्ध विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से भारतीय दृष्टि और मूल्यों को पुनर्जीवित करने की दिशा में काम कर रहा है। यदि आप इस प्रयास में सहभागी बनना चाहते हैं, तो हमसे जुड़ें।
